नई दिल्ली | खबरगंज ब्यूरो: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान वायनाड सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने पहले ही भाषण में सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री के ऐतिहासिक दावों को चुनौती देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री भाषण तो अच्छा देते हैं, लेकिन तथ्यों के मामले में अक्सर कमजोर साबित होते हैं।
‘भाषण कला में माहिर, पर तथ्यों में कच्चे’
चर्चा की शुरुआत करते हुए प्रियंका गांधी ने तंज कसते हुए कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री जी भाषण बहुत अच्छा देते हैं, थोड़ा लंबा होता है लेकिन अच्छा होता है। बस उनकी एक ही कमजोरी है कि वे तथ्यों के मामले में कमजोर पड़ जाते हैं।”
उन्होंने कहा कि तथ्यों को जनता के सामने रखने की भी एक कला होती है और वे अभी सदन में नई हैं, कलाकार नहीं, बल्कि जनता की प्रतिनिधि हैं, इसलिए वे केवल तथ्य रखेंगी।
इतिहास को लेकर प्रधानमंत्री को घेरा
प्रियंका गांधी ने ‘वंदे मातरम’ के इतिहास को लेकर प्रधानमंत्री के दावों का ‘फैक्ट-चेक’ किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में बताया कि 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार यह गीत गाया था, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कौन सा अधिवेशन था।
प्रियंका ने सवाल दागा:
“उन्होंने (पीएम) यह क्यों नहीं बताया कि वह कांग्रेस का अधिवेशन था? क्या यह हिंदू महासभा का अधिवेशन था? या आरएसएस का? वे इस बात से क्यों कतरा रहे थे कि यह कांग्रेस का अधिवेशन था?”
प्रियंका गांधी द्वारा पेश की गई ‘वंदे मातरम’ की क्रोनोलॉजी
सदन में इतिहास के पन्ने पलटते हुए प्रियंका गांधी ने गीत का सही ऐतिहासिक क्रम (Chronology) समझाया:
- 1875: महाकवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत के पहले दो अंतरे लिखे, जिन्हें आज राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है।
- 1882: सात साल बाद उनका उपन्यास ‘आनंदमठ’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने इस कविता को शामिल किया और इसमें चार और अंतरे जोड़े।
- 1896: कांग्रेस के अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार यह गीत गाया।
- 1905: बंगाल विभाजन के खिलाफ हुए आंदोलन में ‘वंदे मातरम’ जनता की एकता का प्रतीक बन गया।
उन्होंने कहा कि गुरुदेव टैगोर खुद बंगाल की सड़कों पर उतरकर यह गीत गाते थे और ब्रिटिश साम्राज्य इस गीत की शक्ति से कांपता था।
सुभाष चंद्र बोस और नेहरू के पत्रों का जिक्र
प्रधानमंत्री द्वारा 1937 की घटनाओं और जवाहरलाल नेहरू के पत्र का जिक्र किए जाने पर प्रियंका गांधी ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने संदर्भ को अधूरा पेश किया। प्रियंका ने बताया कि 1937 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन का आयोजन कर रहे थे, तो उन्होंने चर्चा से तीन दिन पहले पंडित नेहरू को पत्र लिखा था, जिसे संदर्भ के साथ देखा जाना चाहिए।
अपने भाषण में प्रियंका गांधी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ मातृभूमि के लिए मर-मिटने की भावना जगाता है, लेकिन 1930 के दशक में सांप्रदायिक राजनीति के उभार के साथ इसे विवादित बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। उनका यह भाषण अब सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।












